गुरु जाम्भोजी के बोध का सामाजिक मूल्य- प्रवीण पण्ड्या
सन्त-भक्तों की वैयक्तिक आध्यात्मिक साधना बहुमूल्य है। उसके द्वारा वह जिन समाज मूल्यों को विकसाते हैं, वे न्याय और मनुष्यता की प्रतिष्ठा करते हैं। दुर्भाग्य से, हमारा आधुनिक काल भी पाठ व बोध के बीच गहरे अन्तर को पुष्ट करता रहा। निरीहता, अकिञ्चनता, वैराग्य-ये सबके लिए सहज साध्य नहीं है, किन्तु इनका समाज में प्रतिष्ठा के केन्द्र के रूप में होना नितान्त आवश्यक है। इसके विस्थापन का अर्थ अर्थलोलुप भौतिकता के राक्षसी चेहरे को प्रतिष्ठित करना है।
यह वैराग्य उस देह के प्रति है, जिसके प्रति सर्वाधिक राग होता है। पाँचों यम यानी पंच महाव्रत इस राग की निवृत्ति हैं। भक्ति साहित्य में देहवादी दृष्टि को मनमुखी और आत्मवादी दृष्टि को गुरुमुखी कहा है। कबीर चेताते हैं :
'मन के मते न चा लिए, छाड़ि जीव की बांणि।' (पृ.६६)
यह जीव की वाणी ही नानक की गुरुवाणी है। महात्मा जांभोजी अपनी सबद वाणी के चरम, १२०वें सबद में कहते हैं:
'गुरुमुख मुरखा चढे न पोहण, मनमुख भार उठाव'
यह गुरुमुखिता और मनमुखिता हमारे जीवन की अलग-अलग केन्द्रीयता है। मनमुखिता भोग-विलास को केन्द्र मानकर चलना है और गुरुमुखिता आत्मबोध को केन्द्र बनाकर ऊँचे जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठित करना है। एक स्थूल है और दूसरा सूक्ष्म। कबीर राम को जपने का कहते हैं तो राजस्थान के मरुस्थल के जाम्भोजी विष्णु विष्णु जपने की बात भागवत आदि की नाम कीर्तन परम्परा के भीतर जाकर कहते हैं। प्रश्न किया जाता है कि क्या विष्णु विष्णु कहने से जीवन का उद्धार हो जाएगा ? यदि हाँ तो यह बहुत सरल रास्ता है, पर इसे भी कितने लोग अपनाते हैं या उस पर चल सकते हैं? विष्णु विष्णु कहने का काम तो जिह्वा करेगी किन्तु उसका कोई आभ्यन्तर भी होगा। भारतीय संस्कृति के समस्त बाह्य उपादान केवल बाहरी नहीं होते हैं, उनका अनिवार्य आभ्यन्तर पक्ष होता है। सच तो यह है कि यहाँ उपासना में बाह्य व आभ्यन्तर में एकता साधी जाती है। विष्णु को जपना कहा गया है तो किसी अन्य के जप से रोका भी गया है। हम दिन रात पैसा पैसा, मान प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा आदि जपते रहते हैं और अपने कर्त्तव्य को छोड़ निरन्तर एक ऐसी मृगतृष्णा के पीछे भागते रहते हैं, जो कभी पूरी नहीं होती है। अध्यात्म की भाषा में इसे माया, अविद्या या भ्रम कहते हैं और यह अपने आप में सुखद प्रतीत होती है। इस पर कोई रत्तीभर चोट पहुँचती है तो हम तड़प उठते हैं। इसे उपनिषद प्रमाद कहते हैं और प्रमाद अपने आप द्वारा अपनी मौत को न्यौता देना बताते हैं। मनमानी और स्वच्छंदता हम क्यों चाहते हैं ? कि शरीर सुखी रहे और हमें बिना श्रम, बिना कष्ट जो हम चाहें, वह मिलता रहे। पूँजीवाद की व्याख्या मार्क्स ने की जरूर है, किन्तु वह उसकी जड़ को नहीं पकड़ सका है। मनमुखिता यानी बहिर्मुखिता इसका मूल है। अंतर्मुखिता के बिना व्यक्ति त्याग नहीं, पाप को अपना अभिमान बना लेता है और वही से उसके पतन की कहानी शुरू हो जाती है। उपनिषद ने प्रमाद को मृत्यु कहा है तो वह भारत का युगों का चिंतन है। भौतिकवाद, पूँजीवाद की अमोघ शक्ति के विरुद्ध यहाँ गुरुमुखिता का संदेश है। आत्मा ही गुरु है। उसकी ओर उन्मुख होने पर व्यक्ति के अभिमान के विषय बदल जाते हैं, वह तुच्छता से दिनानुदिन मुक्त होने का वास्तविक प्रयत्न करता है, न कि अपनी बुद्धि के कल्पित बहानों की ओट में छिपता है।
कबीर कहते हैं:
नान्हां काती चित दे, महंगे मोल बिकाइ।
गाहक राजा राम है, और न नेडा आइ ॥
चित्त को सूक्ष्म से सूक्ष्म कातने में लगाना है। यह सूक्ष्मता राजा राम ही ग्रहण कर सकते हैं। यहाँ जो जीवन-मूल्य है, वह पूरे समाज को बदल देता है। बर्बरता स्थूलता से जन्मती है और फैलती है। वर्तमान समाज में इस वैयक्तिक साधना के प्रति आस्था का अभाव है और वही इसकी क्रूरता है। यह पहले भी थी और आज भी है।
संदर्भ: प्राचार्य श्री प्रवीण पंड्या के ‘भक्तिकालीन हिन्दी साहित्य का आत्मस्वर’ (2018) से।